
यरूशलेम की पहाड़ियों से लेकर गाज़ा की धूलभरी गलियों तक, एक शब्द बार-बार फुसफुसाहट की तरह सुनाई देता है – “ग्रेटर इज़राइल।” किसी के लिए यह बाइबिल की भविष्यवाणी है। किसी के लिए यह राजनीतिक कल्पना। और अरब दुनिया के लिए यह एक संभावित भू-राजनीतिक खतरे की तरह देखा जाता है।
क्या सचमुच नील नदी से यूफ्रेट्स तक फैला कोई सपना मौजूद है? या यह इतिहास, धर्म और राजनीति की परतों से बना एक ऐसा विचार है जिसे अलग-अलग लोग अपने हिसाब से पढ़ते हैं?
इस रिपोर्ट में हम उसी जटिल सवाल की परतें खोलते हैं।
“ग्रेटर इज़राइल” या हिब्रू में “एरेत्ज़ यिस्राएल हाश्लेमा” एक ऐसा शब्द है जिसने दशकों से मध्य-पूर्व की राजनीति को प्रभावित किया है। इसका अर्थ अलग-अलग संदर्भों में बदलता रहा है। कुछ लोगों के लिए यह केवल आधुनिक इज़राइल और उसके कब्ज़े वाले क्षेत्रों का संकेत है, जबकि कुछ धार्मिक या राष्ट्रवादी व्याख्याओं में यह एक बहुत बड़े क्षेत्र का प्रतीक माना जाता है।
आमतौर पर यह शब्द दो अलग-अलग अर्थों में प्रयोग होता है।
पहला अर्थ अपेक्षाकृत सीमित है। इसमें आधुनिक इज़राइल, वेस्ट बैंक, गाज़ा पट्टी और गोलान हाइट्स जैसे क्षेत्रों को शामिल किया जाता है।
दूसरा अर्थ कहीं अधिक व्यापक है। कुछ धार्मिक व्याख्याओं के अनुसार यह क्षेत्र नील नदी से लेकर यूफ्रेट्स नदी तक फैला हुआ माना जाता है।
यही वजह है कि यह अवधारणा विवादों के केंद्र में रहती है। अरब देशों और फिलिस्तीनियों के लिए यह विचार अक्सर विस्तारवादी महत्वाकांक्षा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। वहीं इज़राइल के कई विद्वान और राजनेता कहते हैं कि “ग्रेटर इज़राइल” कोई आधिकारिक नीति नहीं बल्कि ऐतिहासिक या धार्मिक कल्पना भर है।
आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह शब्द इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मध्य-पूर्व दुनिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है। यहाँ की सीमाएँ, धार्मिक स्थल और संसाधन वैश्विक कूटनीति को प्रभावित करते हैं।
आज के दौर में जब इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष बार-बार हिंसा में बदल जाता है, तब “ग्रेटर इज़राइल” जैसी अवधारणाएँ केवल अकादमिक बहस नहीं रह जातीं। वे कूटनीतिक बयानबाज़ी, राजनीतिक नारों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में दिखाई देने लगती हैं।
इसलिए इस विचार को समझने के लिए हमें इतिहास, धर्म और राजनीति की लंबी यात्रा से गुजरना होगा।
बाइबिल और धार्मिक आधार एरेत्ज़ इज़राइल की अवधारणा
यहूदी धार्मिक परंपरा में “एरेत्ज़ इज़राइल” यानी “इज़राइल की भूमि” एक गहरी आध्यात्मिक और ऐतिहासिक अवधारणा है। हिब्रू बाइबिल में इसे उस भूमि के रूप में वर्णित किया गया है जिसे ईश्वर ने अब्राहम और उनके वंशजों को देने का वादा किया था।
यह अवधारणा केवल भूगोल नहीं बल्कि धार्मिक पहचान से भी जुड़ी है। यहूदी परंपरा में यह भूमि पवित्र मानी जाती है क्योंकि यहीं पर कई धार्मिक घटनाएँ घटित हुईं।
बाइबिल में सीमाओं का उल्लेख
बाइबिल में इस भूमि की सीमाएँ अलग-अलग जगहों पर अलग तरह से बताई गई हैं।
उत्पत्ति (Genesis)
उत्पत्ति 15:18 में उल्लेख मिलता है कि ईश्वर ने अब्राहम से कहा कि उनकी संतानों को “मिस्र की नदी से लेकर महान नदी यूफ्रेट्स तक” की भूमि दी जाएगी।
निर्गमन और व्यवस्थाविवरण
कुछ अन्य अध्यायों में सीमाएँ अपेक्षाकृत छोटी दिखाई देती हैं, जिनमें कनान क्षेत्र का उल्लेख है।
गिनती और यहेजकेल
गिनती 34 और यहेजकेल 47 में एक अधिक स्पष्ट भूगोल मिलता है जिसमें भूमध्यसागर, जॉर्डन नदी और नेगेव क्षेत्र जैसी सीमाओं का वर्णन है।
नील से यूफ्रेट्स तक का धार्मिक अर्थ
धार्मिक विद्वानों के अनुसार “नील से यूफ्रेट्स तक” का उल्लेख हमेशा शाब्दिक भू-राजनीतिक सीमा नहीं माना जाता। कई धर्मशास्त्री इसे प्रतीकात्मक भाषा भी बताते हैं।
कुछ यहूदी धार्मिक समूह इसे भविष्य में आने वाले मसीही युग से जोड़ते हैं। जबकि कई आधुनिक यहूदी विद्वान इसे ऐतिहासिक संदर्भ में पढ़ते हैं, न कि राजनीतिक दावे के रूप में।
इस प्रकार धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या ही वह जगह है जहाँ से “ग्रेटर इज़राइल” की बहस शुरू होती है।
प्रारंभिक ज़ायोनिज़्म और थियोडोर हर्ज़ल
19वीं सदी के अंत में यूरोप में यहूदियों के खिलाफ बढ़ते उत्पीड़न ने एक नए राजनीतिक आंदोलन को जन्म दिया जिसे ज़ायोनिज़्म कहा गया। इस आंदोलन का उद्देश्य था एक सुरक्षित यहूदी राष्ट्रीय घर की स्थापना।
थियोडोर हर्ज़ल की भूमिका
ऑस्ट्रो-हंगेरियन पत्रकार थियोडोर हर्ज़ल को आधुनिक ज़ायोनिज़्म का संस्थापक माना जाता है। 1896 में उनकी किताब “द ज्यूइश स्टेट” ने यह विचार रखा कि यहूदियों को अपना स्वतंत्र राज्य चाहिए।
हर्ज़ल ने फिलिस्तीन को इस राज्य के लिए सबसे उपयुक्त स्थान माना क्योंकि यह ऐतिहासिक और धार्मिक रूप से यहूदियों से जुड़ा था।
सीमाओं पर विचार
हर्ज़ल के विचार समय के साथ बदलते रहे। उनकी डायरी में यह उल्लेख मिलता है कि कुछ समर्थक बाइबिल की सीमाओं का हवाला देते थे। हालांकि हर्ज़ल स्वयं व्यावहारिक राजनीति को अधिक महत्व देते थे।

ईसाई ज़ायोनिस्ट प्रभाव
दिलचस्प बात यह है कि कुछ ईसाई विचारकों ने भी यहूदियों की वापसी का समर्थन किया। ब्रिटिश ईसाई ज़ायोनिस्ट विलियम हेचलर ने हर्ज़ल को प्रभावित किया और बाइबिल की भविष्यवाणियों का हवाला दिया।
इस दौर में “ग्रेटर इज़राइल” कोई औपचारिक योजना नहीं था, लेकिन धार्मिक और ऐतिहासिक कल्पनाओं में इसका जिक्र मौजूद था।
प्राचीन यहूदी राज्यों का इतिहास
प्राचीन इतिहास में यहूदी राज्यों का अस्तित्व वास्तव में रहा है। लगभग 1000 ईसा पूर्व के आसपास राजा डेविड और उनके पुत्र सोलोमन के समय एक संयुक्त राज्य माना जाता है जिसे “यूनाइटेड किंगडम ऑफ इज़राइल” कहा जाता है। इसकी राजधानी यरूशलेम थी।
उत्तरी और दक्षिणी राज्य
सोलोमन की मृत्यु के बाद राज्य दो भागों में बंट गया:
- उत्तरी राज्य: इज़राइल
- दक्षिणी राज्य: यहूदा
दोनों राज्यों का इतिहास अलग-अलग रहा और अंततः वे विदेशी साम्राज्यों के अधीन हो गए।
द्वितीय मंदिर काल
539 ईसा पूर्व में फारसी सम्राट साइरस महान ने यहूदियों को यरूशलेम लौटने की अनुमति दी। इसके बाद द्वितीय मंदिर का निर्माण हुआ। यह काल लगभग 600 वर्षों तक चला और 70 ईस्वी में रोमन साम्राज्य द्वारा यरूशलेम के विनाश के साथ समाप्त हुआ।
ब्रिटिश जनादेश और बालफोर घोषणा
प्रथम विश्व युद्ध के बाद मध्य-पूर्व की राजनीतिक संरचना बदल गई। 1917 में ब्रिटिश सरकार ने बालफोर घोषणा जारी की। इसमें फिलिस्तीन में “यहूदी लोगों के लिए राष्ट्रीय घर” की स्थापना का समर्थन किया गया। उस समय यह क्षेत्र ओटोमन साम्राज्य के अधीन था। युद्ध के बाद ब्रिटेन को फिलिस्तीन का जनादेश मिला और यहूदी आव्रजन धीरे-धीरे बढ़ने लगा। इससे अरब आबादी और यहूदी समुदाय के बीच तनाव बढ़ गया।
1948 के बाद का इज़राइल
1948 में इज़राइल राज्य की स्थापना हुई। इसके साथ ही पहला अरब-इज़राइल युद्ध शुरू हो गया।
1967 का छह-दिवसीय युद्ध
1967 में हुए युद्ध में इज़राइल ने कई क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया:
- वेस्ट बैंक
- गाज़ा पट्टी
- गोलान हाइट्स
- सिनाई प्रायद्वीप
इन क्षेत्रों की स्थिति आज भी मध्य-पूर्व की राजनीति का सबसे बड़ा विवाद है।
ग्रेटर इज़राइल आंदोलन
1967 के बाद कुछ समूहों ने “ग्रेटर इज़राइल” की अवधारणा को अधिक जोर से उठाना शुरू किया।
गुश एमूनिम
1970 के दशक में उभरा यह धार्मिक आंदोलन वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों का समर्थन करता था।
लिकुड पार्टी
दक्षिणपंथी राजनीतिक दल लिकुड ने भी कुछ समय तक इन क्षेत्रों पर नियंत्रण बनाए रखने का समर्थन किया। हालांकि इज़राइल की मुख्यधारा राजनीति में इस विषय पर मतभेद रहे हैं।
आज “ग्रेटर इज़राइल” शब्द का प्रयोग अक्सर राजनीतिक बहसों में होता है। अरब देशों और फिलिस्तीन के नेताओं ने कई बार आरोप लगाया कि इज़राइल विस्तारवादी नीति अपना रहा है।
दूसरी ओर कई इज़राइली नेता कहते हैं कि यह शब्द वास्तविक नीति का प्रतिनिधित्व नहीं करता।
इज़राइली ध्वज विवाद
कभी-कभी दावा किया जाता है कि ध्वज की दो नीली पट्टियाँ नील और यूफ्रेट्स का प्रतीक हैं। लेकिन इतिहासकार इसे गलत बताते हैं। ध्वज का डिज़ाइन पारंपरिक तल्लीत प्रार्थना शॉल से लिया गया है।
अगोरॉट सिक्का
एक और सिद्धांत कहता है कि इज़राइली सिक्के पर “ग्रेटर इज़राइल” का नक्शा बना है। विद्वानों के अनुसार यह भी गलत व्याख्या है।
“ग्रेटर इज़राइल” एक जटिल अवधारणा है जिसमें धर्म, इतिहास और राजनीति तीनों की परतें शामिल हैं। कुछ लोगों के लिए यह धार्मिक भविष्यवाणी है। कुछ के लिए यह राष्ट्रवादी विचारधारा। और कई विद्वानों के लिए यह केवल ऐतिहासिक विमर्श का हिस्सा है।
मध्य-पूर्व की शांति प्रक्रिया इसी वजह से कठिन बनी रहती है क्योंकि भूमि, पहचान और इतिहास एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। भविष्य में क्षेत्र की स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि राजनीतिक समाधान कितने संतुलित और व्यावहारिक होते हैं।
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